health

Breaking News

जौनपुर - बीजेपी के लिए जौनपुर से चुनाव का आगाज करना शुभ है-सतीश कुमार सिंह 24UPNEWS.COM पर

सरकार से है एक सवाल-मातृभाषा हिन्दी कब बनेगी राष्ट्रभाषा

कपिल देव मौर्य
हिन्दी दिवस के अवसर पर पूर्व के वर्षो की तरह इस वर्ष भी पूरे देश में हिन्दी दिवस का आयोजन कर स्थिति एवं उपेक्षा पर लम्बी चैड़ी चर्चा परिचर्चा की गयी लेकिन एक सवाल आज भी बरकरार है कि देश की इस मातृ भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा क्यों नही मिल सका है। इसका जबाब न तो राजनेता देते है न ही वे जिम्मेदार लोग जो हिन्दी के विकास एवं उत्थान का दम भरते नही थकते है। सवाल यह भी है कि ऐसी क्या बात है कि हमारी मातृ भाषा हिन्दी केवल राजभाषा तक सीमित हो कर रह गयी है। इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में आखिरकार क्या कठिनायी देश की सरकार को हो रही है। आज देश का एक बड़ा जिम्मेदार तपका हिन्दी बोलने में क्यों शर्म महसूस कर रहा है। इस तरह के तमाम सवालो का जबाब देश की आवाम जानना चाहती है।
    देव भाषा संस्कृत से बनी हिन्दी भाषा को देश को एक सूत्र मे बांधने के लिए मातृ भाषा के रूप मे स्वीकारते हुए इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग उठने पर सन् 1949 में 14 सितम्बर को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। लेकिन जन मांग के अनुरूप आज भी इसको राष्ट्रभाषा का दर्जा नही मिल सका है। जब भी देश में इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की आवाज उठती है अपने ही देश के राज्यो से बिरोध की आवाज उठने लगती है। ऐसा क्यो किया जाता है जब हम अपनी मातृभाषा को सम्मान नही दे पा रहे है। तो हम कैसे उम्मीद करते है कि हममे एकता रहेगी हम एक सूत्र मे कैसे बधेगे।
    हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा आज तक नही दिलापाने वाले लम्बरदार लोग प्रति वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस काआयोजन कर लम्बा चैड़ा भाषण देते हुए इसकी उपेक्षा की चर्चा केसाथ विकास की बात करके जिम्मेदारी से मुक्त होते नजर आते है।बाद में हिन्दी को भुलाकर फिर अंग्रेजियत की धारा मे बह जाते है।इन परिस्थतियो मे क्या हिन्दी का कुछ विकास संभव है। हिन्दी मातृभाषा है लेकिन एक बड़ी बिडम्बना यह है कि पूरे देश का सर्वे किया जाये तो कुछ प्रान्तो को छोड़ कर लोग हिन्दी को जानते हुए भी हिन्दी बोलना उचित नही समझते है। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि हिन्दी की स्थिति क्या है इसे कितना सम्मान मिलता है। 
     बतादे कि हिन्दी किसी जाति या मजहब की भाषा नही है देश की उन्नति एवं ज्ञान के बृद्धि की भाष जरूर है। हिन्दी की लिपि मे लाखों शब्दो का भन्डारण है इसका उच्चारण भी सरल है फिर भी लोग इससे परहेज करते है। जबकि दूसरी भाषा अंग्रजी जिसके सहारे देश विकास की राह तय करने मे जुटा है उसकी लिपि मे शब्दो की संख्या महज कुछ हजार मे है फिर भी इसे प्राथमिकता मिल रही है। यह स्थिति जहां हिन्दी के दुर्भाग्य का संकेत देता है वही पर देश को सवालो के कटघरे में भी खड़ा करता है। हां इतना जरूर है कि देश की केन्द्र सरकार द्वारा नारा दिया जाता है कि सरकारी काम काज हिन्दी मे किये जायें। लकिन सच्चाई यह है कि केन्द्र सरकार के सभी कार्य अंग्रेजी में ही होते है। यह दोहरी ब्यवस्था क्यों है क्या इसका जबाब सरकार के नुमायीन्दो के पास है।
     आज हिन्दी के विकास के लिए चुनौती तो सरकार की नीतियां है यह सबसे बड़ा दुखद  पहलू है कि आज भी हिन्दी सरकारी कामकाज की भाषा नही बन सकी है। लेकिन हिन्दी दिवस के दिन जिम्मेदार लोग शोर खूब मचाते है। बाद में भूल जाते है कि हिन्दी दिवस पर क्या संकल्प लिया है। हिन्दी का विकास तब माना जायेगा जब सरकार इसे भारतीय भाषा घोषित कर पूरे देश में सरकारी कामकाज हिन्दी में सुनिश्चित कराये और उसकी लगातार समीक्षा भी करे  कि कौन इसका अनुपालन कर रहा है कैान नही सरकार इसके प्रति कड़ा निर्णय ले तब सायद लोग इस मातृभाषा को दिल से स्वीकार कर सकेगे, अन्यथा केवल गाल बजाने से हिन्दी का विकास होना संदिग्ध प्रतीत होता है।

No comments:

Post a Comment