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....मेरे बच्चे का मिसिंग कंप्लेंट दर्ज कर लो दरोगा साहब।

जफराबाद कस्बे का रिक्शा चालक,लापता बेटे की मिसिंग कंप्लेंट के लिए छ: दिन से थाने पर लगा रहा चक्कर।
साभार अखिलेश सिंह
जफराबाद (जौनपुर) बड़े बाप की औलाद होता तो तत्काल थाने पर सुनवाई भी होती और कार्रवाई भी। यहां तो मामला रिक्शा चलाने वाले मजदूर का है। ऐसे गरीब के मामले में भला साहब क्यों रुचि लें। पिछले छ: दिन से मजदूर एवं मजबूर बाप अपने बेटे की मिसिंग कंप्लेंट के लिए थाने पर चक्कर लगा रहा है, लेकिन साहब को फुर्सत ही नहीं। छ: दिन से उसे टरकाया तथा दौड़ाया जा रहा है। पुलिस की यह कार्य शैली विभाग के प्रति जनता में विश्वास के लिए घातक साबित हो रहा है, इस बात से इनकार नही किया जा सकता। वहीं रोज तमाम ऐसे कंप्लेन आते हैं, जिसमे हजूर को आगम दिखाई देता है, खूब रुचि लेते हैं। आगम वालो को करवाई की खूब बनर घुड़की भी देते है, आशय तो कुछ और ही होता है, ये तो आप समझ ही रहे होंगे।

हम बात कर रहे हैं नगर पंचायत जफराबाद के मोहल्ला नासही, दलित बस्ती के रिक्शा चालक, घूरे राम की। इनका 12 वर्षीय पुत्र पिंटू उर्फ करिया पिछले चार जुलाई को दिन में दोपहर दो बजे साइकिल चलाने के लिए घर से निकला और साइकिल सहित लापता हो गया। घूरे राम चार दिन तक दूरदराज के सभी रिश्तेदारों में उसको तलाशने की कोशिश किया। सफलता हाथ नहीं लगी तो वह पांच जुलाई को थाने पर अपने बेटे के मिसिंग कंप्लेंट के लिए पहुंचा। पहले दिन थाने पर दिवान ने मिसिंग कंप्लेंट की प्रक्रिया में गायब बेटे के फोटो की कई प्रकार की साइज में फोटो बनवाकर लाने के लिए कहा। दूसरे दिन कई प्रकार कि साइज में फोटो बनवाकर थाने पहुंचा तो उसे मिसिंग कंप्लेंट का प्रोफार्मा देकर बाहर किसी कंप्यूटर की दुकान से तैयार कराने को कहा। बाजार के कंप्यूटर की दुकान पर उसने सात सौ रुपये खर्च करके पुलिस के द्वारा बताए गए आदेश के अनुसार तमाम प्रति में प्रोफार्मा तैयार करवाया। तीसरे दिन उक्त सभी कागजात तथा फोटो लेकर थाने पर पहुंचा तो उसे बताया गया कि बड़े साहब नहीं है, अगले दिन बुलाया। चौथे दिन पहुंचा तो उसे बताया कि कंप्यूटर खराब हो गया है। उसे वापस लौटा दिया। इस प्रकार पिछले छ: दिन से गायब पुत्र की पीड़ा को लेकर एक मजदूर बाप थाने पर सुबह से लेकर शाम तक साहब लोगों से मदद मांगने को लेकर पूरा पूरा दिन बिना खाए पिए थाने पर गुजार दे रहा है। गायब बेटे को खोजने की बात तो दूर कंप्लेंट न लिखने तथा आनाकानी करने वाले इस महकमे की कार्यशैली पर चिंता तथा अफसोस होने लगा है। छठवें दिन बुधवार को भी उसकी कंप्लेंट दर्ज नहीं की गई। पुलिस से ना उम्मीद होकर घूरे राम अपने आंख में बच्चे के गम का आंसू लेकर रोते हुए घर वापस हो गया। इन पुलिस वालों को क्या हो गया है ? क्या इस विभाग के इन जिम्मेदारों को ऐसे  लाचारों के मामलों मे कोई रुचि नही रह गई ? जबकि दिन भर साहब लोग, तमाम ऐसे मामले होते हैं, जिसको बहुत ही गंभीरता व तत्परता के साथ रुचि लेकर अंजाम देते हैं। उसके पीछे तो कारण कुछ और ही होता है। रुचि क्यों और किस प्रकार की होती है आप भुक्तभोगी होंगे तो समझ रहे होंगे या भुक्तभोगीयों के मुंह से सुनते ही होंगे। क्या यह कहना गलत होगा कि पुलिस की इस तरह की कार्यशैली से आम लोगों का भरोसा उठता चला जा रहा है ?

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