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क्या, ठेकेदार अवधेश कुमार ने देश को कमीशन के कैंसर से बचाने के लिए, दिया है "बलिदान"।

आत्महत्या नहीं, बलिदान है ये।
....यहां कमीशन के खेल में हो रहा नंगा नाच ? निर्धारित, कमीशन की होती हैं चर्चाऐं, इसे रोकने का क्या है विकल्प।
रिपोर्ट-अखिलेश सिंह
जौनपुर-क्या कमीशन के खेल में बुधवार को वाराणसी के ठेकेदार अवधेश कुमार श्रीवास्तव ने लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता के समक्ष अपने आप को गोली मारकर, देश को कमीशन खोरी के कैंसर से बचाने के लिए "बलिदान"दिया है। मैं तो कहूंगा "आत्महत्या नहीं, बलिदान है ये"। अब, सरकार, के साथ-साथ ईमानदार अधिकारी, शिक्षक, अधिवक्ता, समाजसेवी , समाज के ईमानदार लोग, कमीशन की मार झेल रहे ठेकेदार, देश के छात्र, देश के समस्त नागरिको की जिम्मेदारी बनती है कि "मिशन" बनाकर भ्रष्टाचार, घूसखोरी तथा कमीशन खोरी को खत्म करने की लड़ाई लड़े। अवधेश कुमार ने अपना बलिदान देकर कमीशन खोरी में हो रहे नंगे नाच का खुलासा किया है। कमीशन खोरी के खुलासे के लिए अब इससे बड़ा कदम क्या हो सकता है ? अवधेश श्रीवास्तव का बलिदान बेकार न जाने दें। कमीशन खोर, देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं। अक्सर सुनने को मिलता है कि यहां कमीशन के खेल में नंगा नाच चल रहा है। जिम्मेदार मुंह बाए खड़े हैं। चोरी-छिपे सबका हिस्सा बधा हुआ है। कमीशन की मार झेलने वाले पीड़ित ठेकेदारों से अक्सर कमीशन के खेल की चर्चाए सुनने को मिलती हैं। जनपद जौनपुर के एक छोटे से नगर पंचायत में कमीशन के खेल की कहानी एक ठेकेदार तथा ईमानदार सभासद ने सुनाया कि इस नगर पंचायत में वर्षों से जनता के द्वारा चुने गए "सर्वेसर्वा" को 12% कमीशन चल रहा है। सरकार द्वारा भेजे गए जिम्मेदार को 6%। जनता द्वारा चुने गए छोटे जिम्मेदार को 3%, ऑफिस में बैठकर लिखा पढ़ी करने वाले जिम्मेदार को 2%, तथा फीता लगाकर 3,5 करने वाले को 3% है। कुल मिलाकर 26% कमीशन का हिसाब होता है। कार्य के बाद भुगतान लेने वाला, भुगतान के लिए फाइल लेकर जिम्मेदारों का चक्कर लगाता है। पहले कमिशन फिर भुगतान के फंडे में उलझा रहता है। यहां ऊपर से लेकर नीचे तक सारी व्यवस्थाएं अच्छी तरह से मैनेज है। कमीशन के लिए अपने चहेते तथा विश्वसनीय लोगो को कार्य बाटने की मैनेजमेंट व्यवस्था अच्छी है। इतने सफाई के साथ खेल चलता है कि बात सिर्फ चर्चाओं तक रह जाती है, प्रमाण कुछ नहीं छोड़ते। इतना ही नहीं यहां का सर्वेसर्वा ईमानदारी के 12% के अलावा ठेकेदारों से कुछ अलग से कमीशन की मांग कर, ले लेता है।

उक्त नगर पंचायत में कमीशन के खेल की अभी हाल में ही एक चर्चा प्रकाश में आई थी। प्रत्येक माह में विकास कार्यों के लिए होने वाली बैठक में, जिम्मेदारों की एक बैठक हुई थी, जिसमें छोटे जिम्मेदारों को सही मात्रा में कमीशन न मिलने पर विरोध होने लगा। आरोप था कि "बड़े जिम्मेदार" कमीशन खोरी में भी चोरी कर रहे हैं। छोटों के कमीशन पर बड़े जिम्मेदार हिसाब कर ले रहे हैं। छोटे जिम्मेदारों को ईमानदारी से कमीशन न मिलने पर, अपने पद तथा पावर का एहसास कराने के लिए बैठक का बहिष्कार कर दिया था। कुछ दिनों तक किसी भी विकास कार्य के लिए कोई प्रस्ताव नहीं हुआ। जब प्रस्ताव ही नहीं तो कार्य कहां से होंगे। जब कार्य नहीं होगा तो भुगतान भी नहीं होगा। भुगतान नहीं होगा तो कमीशन कहाँ से मिलेगा? जिससे कमीशन खोरो की दुकान प्रभावित होते दिखाई देने लगी। नुकसान होते देख कमीशन खोरो ने आपस में समझौता किया। ईमानदारी के साथ कमीशन बांटने की बात पर सुलह समझौता हुआ। वैसे तो कमीशन खोरी के बारे में जानते सभी हैं, लेकिन रोकेगा कौन? मैं तो मानता हूं कि अवधेश कुमार ने अपना बलिदान देकर सरकार, मीडिया तथा देश के लोगों को आगाह किया है। क्या यह कहना गलत होगा कि अवधेश ने कमीशन खोरी जैसे कैंसर को खत्म करने की क्रांति के लिए अपना बलिदान दिया है।

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